ghar me dakhil hone ki dua in hindi
आज आप यहाँ एक बहुत ही ख़ूबसूरत और अहम दुआ, यानी Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua in Hindi, जानेंगे। यहाँ हमने घर में दाखिल होने की दुआ को आपके लिए अरबी के साथ-साथ आसान हिंदी और English में भी लिखा है, ताकि आप इसे आसानी से पढ़ और समझ सकें।
इस दुआ को एक बार ध्यान से पढ़ लेने के बाद आप इसे आसानी से अपने दिल और जेहन में बसा सकते हैं और जब भी घर में दाखिल हों, सही तरीके से यह दुआ पढ़ सकते हैं।
यक़ीनन, एक बार दुआ को अच्छी तरह पढ़कर याद कर लेने के बाद आपको हर बार घर में दाखिल होने की दुआ ढूँढने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। इसलिए इस दुआ को ध्यान से पढ़ें, समझें और इसे अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बनाने की कोशिश करें।
Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua in Hindi
घर में दाखिल होते वक्त पढ़ी जाने वाली इस दुआ में बंदा अल्लाह तआला से घर में दाखिल होने और बाहर निकलने में ख़ैर व भलाई माँगता है और अपने रब पर भरोसा करने का इज़हार करता है। घर में दाखिल होने के बाद अपने घरवालों को सलाम करने का भी ज़िक्र रिवायत में मिलता है।
यह दुआ हज़रत अबू मालिक अशअरी رضي الله عنه से मर्वी है और सुनन अबू दाऊद, हदीस नंबर 5096 में आई है।
Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua in Hindi
अल्लाहुम्मा इन्नी अस्अलुका ख़ैरल-मौलिजि व ख़ैरल-मख़रिजि, बिस्मिल्लाहि वलज्ना, व बिस्मिल्लाहि ख़रज्ना, व अलल्लाहि रब्बिना तवक्कल्ना।
Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua in Arabic
اللَّهُمَّ إِنِّي أَسْأَلُكَ خَيْرَ الْمَوْلَجِ وَخَيْرَ الْمَخْرَجِ، بِسْمِ اللَّهِ وَلَجْنَا، وَبِسْمِ اللَّهِ خَرَجْنَا، وَعَلَى اللَّهِ رَبِّنَا تَوَكَّلْنَا
Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua in English Transliteration
Allahumma inni as’aluka khairal-mawlaji wa khairal-makhraji, bismillahi walajna, wa bismillahi kharajna, wa ‘alallahi rabbina tawakkalna.
Ghar Me Dakhil Hone Ki Dua Ka Tarjuma
ऐ अल्लाह! मैं तुझसे दाखिल होने की भलाई और निकलने की भलाई माँगता हूँ। अल्लाह के नाम से हम दाखिल हुए और अल्लाह के नाम से हम बाहर निकले, और हम अपने रब अल्लाह ही पर भरोसा करते हैं।
दुआ पढ़ने के बाद अपने घरवालों को सलाम करना भी रिवायत में बयान हुआ है।
इस दुआ को कब पढ़ें?
जब आप अपने घर में दाखिल हों, तो अल्लाह का नाम लेकर यह दुआ पढ़ सकते हैं। इसके बाद घर में मौजूद लोगों को सलाम करें। इस तरह घर में दाखिल होना अल्लाह की याद और सलाम के साथ होता है।
घर में दाखिल होने का सुन्नत तरीका
घर में दाखिल होना भी इस्लाम के खूबसूरत आदाब में शामिल है। इस्लाम हमें सिखाता है कि अपने घर में दाखिल होते वक्त अल्लाह को याद करें, घरवालों को सलाम करें और दूसरों के घर में दाखिल होने से पहले उनकी इजाज़त लें।
घर में दाखिल होते वक्त इन बातों का ख़याल रखना चाहिए:
- घर में दाखिल होते वक्त अल्लाह का नाम लें और घर में मौजूद लोगों को “अस्सलामु अलैकुम व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू” कहकर सलाम करें।
- अगर घर में कोई मौजूद न हो, तो कुछ अहले-इल्म ने “अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन” कहने का ज़िक्र किया है।
- किसी दूसरे के घर में दाखिल होने से पहले सलाम करके इजाज़त लेना चाहिए। बिना इजाज़त किसी के घर में दाखिल होना सही नहीं है।
- अगर तीन बार इजाज़त माँगने के बावजूद इजाज़त न मिले, तो अदब के साथ वापस लौट जाना चाहिए। यह बात सहीह हदीस से साबित है।
घर में दाखिल होने के आदाब
घर हमारे लिए सुकून और पनाह की जगह है। इसलिए घर में दाखिल होते वक्त अल्लाह को याद करना और घरवालों को सलाम करना एक खूबसूरत इस्लामी अदब है।
क़ुरआन में भी घरों में दाखिल होने के सिलसिले में सलाम का ज़िक्र आया है। इसलिए जब अपने घर लौटें, तो घरवालों से सलाम करें और कोशिश करें कि घर में दाखिल होने की शुरुआत ही अच्छे अल्फ़ाज़ और अल्लाह की याद से हो।
अगर किसी दूसरे के घर जाना हो, तो पहले सलाम करें और इजाज़त माँगें। अगर इजाज़त न मिले, तो ज़िद या बार-बार परेशान करने के बजाय वापस लौट जाना चाहिए।
घर में दाखिल होने के तरीके से जुड़ी ख़ास हदीस
सहीह अल-बुख़ारी, हदीस नंबर 6245 में हज़रत अबू मूसा अशअरी رضي الله عنه से रिवायत है कि वह हज़रत उमर رضي الله عنه के पास जाने के लिए उनके दरवाज़े पर पहुँचे और तीन बार इजाज़त माँगी। जब उन्हें इजाज़त नहीं मिली, तो वह वापस लौट गए।
हज़रत उमर رضي الله عنه ने उनसे पूछा कि तुम वापस क्यों चले गए? अबू मूसा رضي الله عنه ने बताया कि मैंने तीन बार इजाज़त माँगी, लेकिन जब इजाज़त नहीं मिली तो मैं वापस लौट गया, क्योंकि मैंने रसूलुल्लाह ﷺ को फ़रमाते हुए सुना है:
“जब तुममें से कोई तीन बार इजाज़त माँगे और उसे इजाज़त न दी जाए, तो वह वापस लौट जाए।”
हज़रत उमर رضي الله عنه ने उनसे इस बात की गवाही माँगी। इसके बाद हज़रत अबू मूसा رضي الله عنه लोगों की एक मजलिस में गए और पूछा कि क्या किसी ने रसूलुल्लाह ﷺ से यह बात सुनी है। हज़रत अबू सईद ख़ुदरी رضي الله عنه ने उनकी गवाही दी कि उन्होंने भी नबी ﷺ से यही बात सुनी थी।
इस हदीस से हमें यह खूबसूरत सबक मिलता है कि किसी के घर में दाखिल होने से पहले उसकी इजाज़त लेना ज़रूरी अदब है। अगर तीन बार इजाज़त माँगने के बाद भी इजाज़त न मिले, तो नाराज़ हुए बगैर वापस लौट जाना चाहिए।
एक ज़रूरी बात
घर में दाखिल होने के बारे में कई ऐसी बातें आम हैं जिन्हें लोग सुन्नत समझकर बयान करते हैं। इसलिए किसी भी अमल को “सुन्नत” कहने से पहले उसके लिए सही और भरोसेमंद दलील देख लेना चाहिए।
खास तौर पर घर में दाखिल होते वक्त दाहिना पैर पहले रखना या सूरह इख़लास को ख़ास तौर पर पढ़ना ऐसी बातें हैं जिन्हें इस लेख में नबी ﷺ से साबित सुन्नत के तौर पर पेश नहीं किया गया है।
आख़िरी बात
मेरे प्यारे मोमिनों! अब तक आप घर में दाखिल होने की दुआ के साथ-साथ घर में दाखिल होने के अहम आदाब और किसी दूसरे के घर में जाने के सही तरीके के बारे में भी जान चुके होंगे।
घर हमारे लिए सुकून और पनाह की जगह है। इसलिए घर में दाखिल होते वक्त अल्लाह को याद करना और उसके नाम से दाखिल होना एक खूबसूरत अमल है। इस दुआ को ध्यान से पढ़ें, इसका मतलब समझें और इसे याद करने की कोशिश करें, ताकि जब भी घर में दाखिल हों तो आसानी से इसे पढ़ सकें।
इस्लाम हमें ज़िंदगी के हर छोटे-बड़े मामले में खूबसूरत आदाब सिखाता है। इसलिए जब भी अपने घर में दाखिल हों, अल्लाह को याद करें, घरवालों को सलाम करें और अच्छे अख़लाक़ के साथ घर में दाखिल हों।
और जब किसी दूसरे के घर जाएँ, तो बिना इजाज़त दाखिल न हों। तीन बार इजाज़त माँगने के बाद भी इजाज़त न मिले, तो अदब के साथ वापस लौट जाएँ। यही वह खूबसूरत तालीम है जो हमें रसूलुल्लाह ﷺ की हदीस से मिलती है।
अगर घर में दाखिल होने की दुआ या इससे जुड़े किसी मसले को लेकर आपके मन में कोई सवाल या डाउट हो, तो आप कमेंट करके पूछ सकते हैं। इस जानकारी को अपने दोस्तों और रिश्तेदारों तक भी शेयर करें, ताकि ज़्यादा से ज़्यादा लोग इन खूबसूरत इस्लामी आदाब को जान सकें और अपनी ज़िंदगी में अमल ला सकें।
अल्लाह तआला हमें अपनी ज़िंदगी में अच्छी और मस्नून दुआओं को शामिल करने और उन पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
हदीस का हवाला
यह दुआ हज़रत अबू मालिक अशअरी رضي الله عنه से मर्वी है और सुनन अबू दाऊद (5096) में दर्ज है। इस रिवायत की सेहत के बारे में अहले-इल्म के बीच कुछ इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। इसलिए इसे वेबसाइट पर पेश करते समय “एक रिवायत में यह दुआ आई है” या “अबू दाऊद में मर्वी दुआ” कहना अधिक एहतियाती है, बजाय इसके कि इसे बिला-इख़्तिलाफ़ “सहीह हदीस” कहा जाए।
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